Monday, August 6, 2012

Mara nahi wahi ki jo jiya na aap ke liye

A poem by Maithili sharan Gupt, Mara nahi wahi ki jo jiya na aap ke liye. First time I read this in my school book. Describing the deep thought and disciple of being human now.

विचार लो की मर्त्य हो ना मृत्यु से दरो कभी,
मरो परन्तु योँ मरो की याद जो करे सभी,
हुई ना यूँ सो मृत्यु तो वृथा मरे वृथा जिए,
मारा नहीं वही की जो जिया ना आप के लिए,
यही पशु प्रवृत्ति है की आप आप ही चारे,
वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे | 


उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती,
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजति,
तथा उसी उदार को समस्त स्रिष्टी पूजती |
अखंड आत्मभाव जो अस्सेम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे…


चलो अभिस्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति विघ्न जप पड़े उन्हें धकेलते हुए.
घटे ना हिल मेल हाँ बढे ना भिन्नता कभी,
अतार्क पन्त एक है सतर्क पन्त हो सभी,
तभी समर्थ भाव है की तारता हुआ तारे,
वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे.

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